प्रश्न सूची

मसीही विश्वास इस्लाम से बेहतर क्यों है?

1. परिचय

एकेश्वरवाद एकमात्र ईश्वर के अस्तित्व एवं कार्य में विश्वास है [1] एकेश्वरवादी धर्म जैसे यहूदी, मसीहियत, एवं इस्लाम अन्य धर्मों से अलग हैं क्योंकि वे एक व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास करते हैं [2]. एकेश्वरवादी धर्म अन्य धर्मों से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे उस ईश्वरीय एकता को प्रकट करते हैं और सिर्फ कुछ अंतर्निहित एकता को नहीं। यहूदी धर्म राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ है, जबकि इस्लाम इंद्रियों के संसार से जुड़ा हुआ है। मसीही विश्वास राष्ट्रवाद से स्वतन्त्र है जैसा यहूदी धर्म में है और साथ ही यह इस्लाम के इंद्रियों के संसार से भी स्वतन्त्र है। इसलिए सभी एकेश्वरवादी धर्मों में मसीही विश्वास सबसे शुद्ध है [3]. क्योंकि इस्लाम चिंतन का धर्म है, समर्पण करना और तर्कसंगत होना स्वीकार्य है, यह सौन्दर्यपरक धर्म है। मसीही विश्वास सम्पूर्ण नैतिक मूल्यों के प्रति रूचि रखता है, जैसे मत्ती 5, इस्लाम से कितना अधिक ऊँचा है। मसीही विश्वास में हर एक चीज़ स्वर्ग के राज्य के आगमन के उद्देश्य हेतु कार्य करती है।

2. सत्य

इस्राएल के लोगों की वाचा विफल हुई थी। इसलिए, यहूदी धर्म, पहले एकेश्वरवादी धर्म, को उत्तर देने के लिए बुलाया गया। वाचा की संकट की घड़ी पर विजय पाने के लिए या इसे और अधिक सहने योग्य बनाने के लिए इस उत्तर में कुछ सुधारों को जोड़ जाना था। इस्लाम ने तर्कसंगत सोच को जोड़ दिया और मानव क्षमताओं के अनुकूल हो गया। मसीही विश्वास ने प्रेरणादायक सामर्थ के रूप में परमेश्वर के प्रेम को जोड़ दिया। इस प्रेरणादायक सामर्थ को और कहीं नहीं देखा जाता है जैसा इसे मसीहियत में स्पष्ट रूप देखा जाता है [4]। इस्लाम एवं मसीही विश्वास दोनों एक ऐसे आदर्श से चल रहे हैं जो अद्वितीय रूप से जड़ पकड़े हुए है। अतः, इस्लाम एवं मसीही विश्वास के बीच का वास्तविक निर्णय केवल प्रकाशनों से ही आ सकता है [5] वास्तविक प्रश्न है: इतिहास में ईश्वर के वास्तविक प्रकाशन क्या हैं? तर्कसंगत तर्कों के साथ इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि तर्कसंगत सोच और तथ्य अलग-अलग श्रेणियां हैं। फिर भी लोगों ने हमेशा से उन्हें एक धर्म में मिलाने का प्रयास किया है। और प्रत्येक धर्म के पास अपने तरीके हैं यह दिखने के लिए कि यह तर्कसंगत रीति से उचित है। तर्क केवल उस धर्म के विश्वासियों के लिए ही यकीन दिलाने वाले हैं। मसीही विश्वास में विभिन्न तरीकों से सत्य की खोज करने के विचार को त्याग दिया गया है, क्योंकि केवल पवित्र आत्मा ही सत्य को प्रकट कर सकता है। केवल परमेश्वर ही हमें परमेश्वर से परिचित करा सकता है। मसीही विश्वास की सच्चाई को विभिन्न तरीकों से समझाया नहीं जा सकता है, लेकिन यह अपने आपको विश्वास की विषय-वस्तुओं की घोषणा एवं प्रकटीकरण में सुनने वाले या पढ़ने वाले पर प्रकट करता है, क्योंकि वह जान जाता है कि यह परमेश्वर की सच्चाई है [6]

3. उद्धार

परमेश्वर की सच्चाई का प्रकाशन ही मनुष्य का सच्चा उद्धार है। प्रकाशित सत्य के इस विवरण में निम्नलिखित तीन आवश्यक बिन्दु हैं:

अ. पाप। मसीही विश्वास पाप की धारणा का समर्थन करता है।
ब. यीशु मसीह, मानव जाति का उद्धारकर्ता। लोगों को सभी प्रकार की पीड़ा, दर्द एवं मृत्यु से स्वतन्त्र होने की आवश्यकता है। इसलिए विश्वासी को पाप से स्वतन्त्र किए जाने की आवश्यकता है। मानवजाति का उद्धारकर्ता, यीशु मसीह अपने चरम एवं सिद्ध बलिदान के द्वारा पाप की क्षमा प्रदान करता है। विश्वासी इसके विषय में निश्चित होंगे।
स. पवित्र आत्मा। मसीही विश्वास पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा का समर्थन करता है। व्यक्तिगत जीवन को परमेश्वर के लिए बलिदान करने और पाप की क्षमा के लिए उद्धारकर्ता यीशु मसीह पर भरोसा करने का निर्णय लेने के द्वारा, विश्वासी को विश्वास की मुहर के रूप में पवित्र आत्मा की सामर्थ से सुसज्जित किया जाएगा। विश्वासी जान जाता है कि यह ईश्वर की सच्चाई है।

4. निष्कर्ष

किसी व्यक्ति को इस्लाम के स्थान पर मसीही विश्वास पर क्यों भरोसा करना चाहिए? यह पूर्ण सत्य के ईश्वरीय प्रकाशन के कारण है। केवल मसीही विश्वास में ही मानवजाति के आने वाले उद्धारकर्ता की पूर्ण हुई भविष्यवाणियाँ हैं, चरम सटीक चश्मदीद पांडुलिपियाँ: सुसमाचार। जो कुछ सुसमाचार में लिखा है हम उस पर भरोसा कर सकते हैं। केवल मसीही विश्वास में ही मानवजाति का उद्धारकर्ता है, जिसे किसी इंसान के समान परखा गया था, किन्तु उसने सभी नैतिक परीक्षाओं को उत्तीर्ण किया। इसलिए केवल यीशु मसीह के पास ही यह कहने का अधिकार है: "यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूँ” (यूहन्ना 14:6)।

टिप्पणियाँ

[1] Hans Dieter Betz (ed.), Religion, Past & Present, Volume VIII, Brill, Leiden, 2010, 527.
[2] Albert Hourani, Islam in European Thought, Cambridge University Press, Cambridge, 1992, 24
[3] Friedrich D. E. Schleiermacher, The Christian Faith (translated by H. R. Machintosh and J. S. Steward), Edinburgh: T. & T. Clark, 1928, 38.
[4] Hendrikus Berkhof, Sierd Woudstra, Christian Faith: An Introduction to the Study of the Faith, Wm. B. Eerdmans Publishing, Grand Rapids, 2002, 23.
[5] Friedrich D. E. Schleiermacher, The Christian Faith (translated by H. R. Machintosh and J. S. Steward), Edinburgh: T. & T. Clark, 37.
[6] Hendrikus Berkhof, Sierd Woudstra, Christian Faith: An Introduction to the Study of the Faith, Wm. B. Eerdmans Publishing, Grand Rapids, 2002, 23.